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सत्‍ता की ताकत का खेल चल रहा है पश्चिम बंगाल में

बंगाल में संविधान का खेल तो खत्‍म सा ही लगता है...

     पश्चिम बंगाल की मुख्यमंत्री ममता बनर्जी ने सुप्रीम कोर्ट के समक्ष नेश होकर पश्चिम बंगाल का दुखड़ा सुनाया है। जहां अब कुछ ही दिनों बाद राज्य विधानसभा चुनाव हैं वहां सत्ता की ताकत का खेल खुले आम शुरू हो गया है। केन्द्र में जहां मोदी सरकार सत्ता पर काबिज है वह बंगाल चुनाव जीतने के लिए हद से गुजर जाने को तैयार दिखती है। वहीं पश्चिम बंगाल में जहां टीएमसी की सरकार है वह भी सत्ता में आने के लिए केन्द्र सरकार पर कांउटर अटैक कर रही है।
     पूरी दुनियां पश्चिम बंगाल में लोकतंत्र का नंगा नाच देख रही है। यहां भारत के संविधान का मतलब सत्ता की ताकत रह गया है। पिछले दिनों से एसआईआर को लेकर केन्द्र सरकार ने जो चाल चली है ममता बनर्जी ने उसे नाकाम काने के लिए राज्य की ताकत का इस्तेमाल किया। यहां भारत के संविधान की बात करना तो दूर की कौड़ी हो गया है। यदि कोई संविधान की ताकत पर चुनाव की बात करता है तो उसका जवाब किसी के पास नहीं है। जब पश्चिम बंगाल के चुनावों में भारत के संविधान का का जब कोई जवाब ही नहीं देगा तो फिर वहां कैसा लोकतांत्रिक चुनाव होगा इसका अंदाजा हर कोई लगा सकता है।
     हरियाणा, से लेकर महाराष्ट्र, दिल्ली और बिहार में जो खेल भारतीय चुनाव आयोग ने खेला वहीं खेल अब पश्चिम बंगाल में खेला जा रहा है। जिसके शिकायत ममता बनर्जी से सुप्रीम कोर्ट में भी की है। जाहिर है कि जो खेल इससे पहले जिन राज्यों में हुए चुनावों में खेला गया और उसका जो चुनावी परिणाम सामने आया ऐसा ही चुनाव परिणाम बंगाल में भी लाने का प्रयास किया जा रहा है।
     चुनाव आयोग के खिलाफ झगड़ा इसी बात को लेकर देश भर में जारी है। लेकिन बंगाल में इस खेला में जो रोड़ा है वह यह है कि पश्चिम बंगाल में टीएमसी की पूर्ण बहुमत सरकार है और राज्य की पूरी प्रशासनिक व्यवस्था सत्तारूढ़ दल के पास है। अब कहते हैं कि केन्द्र सरकार ने टीएमसी से जुड़े एक कार्यालय में ईडी की एक रेड करवा दी। ममता बनर्जी को शक हुआ कि यह रेड उनके चुनावी रणनीति को फेल करवाने के लिए करवाई गई और कुछ दस्तावेजों को ईडी भाजपा के लिए अपने कब्जे में लेना चाहती थी। राज्य सरकार ने अपनी ताकत का इस्तेमाल करते हुए पुलिस की ताकत पर ईडी के मनसूबों पर पानी फेर दिया। यह मामला भी सुप्रीम कोर्ट में पहुंचा हुआ है।
     कुलमिलाकर जो भी होगा, बाद में सबके सामने आएगा। फिलहाल पश्चिम बंगाल में दांवपेच इसलिए भिड़ाए जा रहे हैं क्योंकि इस राज्य पर जहां भाजपा अपना कब्जा जमाना चाहती है वहीं ममता बनर्जी भी इस राज्य को अपने हाथ से निकने देना नहीं चाहती हैं। इसलिए यहां संविधान का खेल लगभग खत्म सा ही है और अब यहां खेल इस बात पर खेला जा रहा है कि राज्य सरकार ज्यादा ताकतवर है या केन्द्र सरकार।
     आसान भाषा में कहा जा सकता है कि यहां संवैधानिक और लोकतांत्रिक सरकार बनाने की बातें किसी ओर से नहीं की जा रही है। यहां तो किस सत्ता की भुजाओं में कितना दम है इस बात का चुनाव हो रहा है। यहां एक बात और महत्वपूर्ण है कि जिस संवैधानिक संस्था सुप्रीम कोर्ट के पास इस उदंडता का जवाब देने की ताकत है उसकी मजबूरी यही है कि बाद में यही कहा जा सकता है कि अब तो चिड़िया खेल चुग कर चली गई है। सुप्रीम कोर्ट में रिप्लाई, रिज्वांडर और तारीख का खेल चलता रहेगा और जब सत्ता की भुजाओं की ताकत से चुनाव हो जाएगा तो सारा मामला फ्यूज (इंफ्क्चुअस) हो जाएगा। कुल मिलाकर बंगाल चुनाव में यही इंटस्ट बचा है।

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